कोविड संकट के मध्य मेरी वैष्णों देवी यात्रा
कोविड संकट के मध्य मेरी वैष्णों देवी यात्रा
वह दिन आज भी मुझे नही भूलता जिस दिन मैने ये तय कर ही लिया कि मै इस कोविड संकट में माता वैष्णों देवी के दर्षन करने कटडा जरूर जाउंगा। परिवार के काफी विरोध के बावजूद मै अपनी जिदद पर अड गया था। मेरे इस निर्णय से किसी को खुषी हो ना हो लेकिन मेरी गुनगुन बहुत ही रोमांचित थी। उसके चेहरे पे खुषी देख कर मुझे अपने निर्णय पर सुकून का अहसास हो रहा था। पर अभी थोडे दिन पहले ही पूरा देष कोविड की उस भयावह स्थिति से गुजर चुका था। हर किसी ने अपने किसी खास को हमेषा के लिए खो दिया। कहीं ना कही इस बात को लेकर मन में थोडा डर भी था। क्योंकि ये एक एसा समय था जब हम सब पहली बार अपने आप को असहाय महसूस कर रहे थे। सब कुछ होते हुए भी कुछ नही था। ना डाॅक्टर ना दवाऐं और ना ही अस्पताल। ऐसा लगने लगा था कि पता नही सब पहले की तरह समान्य हो पायेगा या नही। लेकिन बुरा समय कितना भी बुरा हो उसका एक दिन अंत तो होता है। और ऐसा ही हुआ। और फिर जिंदगी एक बार फिर मुस्कराकर पटरी पर दौडने को तैयार हो गई।
जून का महीना था और गर्मी अपना रंग दिखा रही थी। मेरे एक अजीज दोस्त व बडे भाई षाम के वक्त धर पर आए थे चाय पर चर्चा के समय एक बार फिर घूमने जाने का विचार आया । हम दोनो पिछले दो साल से वैष्णों देवी यात्रा का प्रोग्राम बना चुके थे। लेकिन षायद अभी बुलावा नही आया था। उन्होने अपनी मम्मी के ठीक होने की मन्नत मंागी थी और मैने इस गम्भीर संकट मे अपने परिवार की कुषलता की। बातों बातों में तय हुआ कि पहले हेलीकाॅप्टर के टिकिट की उपलब्द्वता को देखते है। यदि होगा तो देखा जाऐगा। अगले ही दिन गुनगुन ने मुझे सुबह उठते के साथ ही याद दिलाया कि हमें रिजर्वेषन देखना है। मै भी थोडा उत्सुक था तो मैने फ्री होकर सबसे पहले हैलीकाॅप्टर का टिकिट देखा और फिर रेलवे का। किस्मत से जिस वीकेंण्ड का हम सोच रहे थे सब उपलब्द्व था। बस फिर क्या था। 9 जुलाई की बुकिंग को लाॅक कर दिया गया। माता वैष्णों देवी ष्राईन बोर्ड ने दर्षनार्थियों के लिए बहुत सी सुविधाऐं दी है। जिसमें से हैलीकाॅप्टर एक है जो कटडा षहर से आप को सांझीछत तक मात्र चार मिनिट में पहुचा देता हैं।
वहां से ढाई किलोमीटर उतर कर आप भवन तक पहुच सकते है। जहां माता रानी का दरबार है। और ये ढाई किमी आपको ज्यादा नही अखरते।। मेरे जैसे अधेड व लम्बोदर किस्म के लोगों के लिए भवन तक पहुचना सिर्फ हेलिकॅाप्टर से ही सम्भव है। और बोर्ड की वेबसाईट ने यात्रा की सभी बुकिंग्स को आसान बना दिया जिसमें यात्रा स्लिप भी एक हैं जिसके लिए पहले आपको कटरा षहर के मध्य बने काउन्टर पर जाकर यात्रा पर्ची लेनी होती थी। कई बार गर्मियों के सीजन में घन्टों लाईन में लगना होता था। लेकिन अब आप हैलीकाॅप्टर की बुकिंग से लेकर बांेर्ड द्वारा संचालित होटलों में कमरे तक सब कुछ बोर्ड की वेबसाईट पर बुक करा सकते है।
इस यात्रा के बारे में साचते सोचते पता नही कब 9 जुलाई आ गई। और हम निकल पडे अलीगढ जक्ंषन की ओर जहां पर हमारी पहली टे्रन गोमती एक्सप्रेस हमें नई दिल्ली ले जाने के लिए अपने निर्धारित समय पर आ चुकी थी। कोविड के इस समय में रेलों में बहुत सुधार हुए है। खासकर उनके टाईम में। और अब सिर्फ कन्फर्म टिकिट के साथ ही यात्रा की जा सकती है। तो फालतू की भीड के लिए कोई जगह नही है। आखिरकार मै गुनगुन और भईया पौने तीन घण्टों के आराम दायक एसी चेयरकार में सफर कर नई दिल्ली पहुच गए।
हमारी टे्रन श्री षक्ति एक्सप्रेस षाम को सात बजे थी तब तक हमने वेटिंग लाउंज में इंतजार किया और राधेष्याम के मषहूर छोले भटूरे के साथ लंच किया। जो नई दिल्ली स्टेषन की पहाडगंज वाली साईड पर सडक पार कर आसानी से लिए जा सकते हैं। वैसे वहां जाकर खाने का अपना अलग ही मजा है। और अगर आप वहां से गुजर रहे हैं ता आपको एक बार जरूर जाना चाहिये। समय की सुई आगे बढी और ट्रेन के चलने का समय हो गया। गुनगुन बहुत ही उतसुक थी और जाते ही कभी इस सीट पर बैठ तो कभी उस सीट पर बैठ कर सेल्फी खींच कर अपनी मम्मी और माॅसी को भेजने लगी। वो वाकई बहुत खुष थी। कुछ घण्टों की यात्रा के बाद ट्रेन लुधियाना स्टेषन पर रूकी और हमारे एक और पार्टनर ने ऐंट्र्री मारी। पीयुष एचडीएफसी बैंक में काम करता है व मेरे दोस्त का भंाजा है। उसके साथ ही आये थे आलु प्याज के गर्मा गरम परांठें जो गुडिया दीदी ने खास हमारे लिए बनाए थे। उसे खाकर हम अपनी अपनी सीट पर चले गए। क्योंकि ट्रेन सुबह जल्दी कटडा स्टेषन पर पहंुचती हैं ।
ट्रेन अपनी रफतार से आगे बढ रही थी और सब धीरे धीरे नींद के आगोष में चले जा रहे थे। कुछ देर बाद अचानक आंख खुली और मोइाईल में टाईम देखा तो सुबह के चार बज रहे थे और ट्रेन जम्मू तवी स्टेषन पर खडी थी। और लोग उतर रहे थे। मैने बहुत कोषिष की की आंख दोबारा लग जाये पर नींद आई ही नही। लेकिन फिर भी हिम्मत कर के उठा और सुबह की ताजी हवा को चूमने ट्रेन के दरवाजे तक आ गया। क्या नजारा था। क्या ताजगी थी हवा में । और वो नजारे वो टनल , एक के बाद एक । मै अपने आप को रोक ही नही पाया और दरवाजे पर खडा रहा । पता नही उधमपुर कब आ गया। वो एक घंण्टे का सफर मै कभी नही भूल सकता । इसी बीच पौं फटने लगी थी और मुझे याद आया कि इस पल को कैमरे में कैद करना तो बनता है। फिर मैने उधमपुर से लेकर कटडा तक लगातार रिकाॅर्डिंग कर हाईपरलैप्स बनाया।
कटडा पहुच कर डेढ घण्टे की माषक्कत कर हमें स्टेषन से बाहर आने की अनुमति मिली। ट्रेन के आते ही सारे यात्रियों को कोविड की जांच करवाने के लिए रोका गया था। जिनके पास निगेटिव रिर्पोट थी उनकी लाईन अलग थी। इससे फारिक होकर हम अपने होटल पहुचे कुछ देर आराम कर हम यात्रा के लिए तैयार हो गए।
षनिवार का दिन था और मौसम सुबह से ही आंख मिचोली खेल रहा था। जैसे ही हम हैलीपैड के लिए रवाना हुए बरखा रानी धीरे धीरे पूरे कटडा षहर को भिगोने लगी थी। और फिर क्या था हेलीकाॅप्टर की फलईट जहां की तहां थमने लगी। हम जैसे जैसे अपना बोर्डिंग पास लेने के लिए लाईन में लग गये और माता रानी से दुआ करने लगे की मौसम को साफ कर दें। बहुत से लोग अपनी टिकिट कैंसिल करा के पैदल जाने के लिए तैयारी करने लगे। मेरी तो हिम्मत जवाब देने लगी थी। पैदल जाने का डर सताने लगा था। लेकिन तभी अचानक बारिष रूकी और मौसम साफ होने लगा। हैलीकाॅप्टर एक बार फिर उडान भरने लगे। और हम अपनी बारी का इंतजार करने लगे। और फिर गुनगुन एक बार फिर चहकने लगी। वो दषनों से ज्यादा हैलीकाॅप्टर में बैठने को लेकर ज्यादा उत्साहित हो रही थी। पहली बार मे ंतो वो थोडा सा डरने लगी थी लेकिन जैसे ही हमने उडान भरी और हम आसमान में थे तो उसका रोमांच देखते ही बनता था। और हम इस पल को और ज्यादा जी पाते उससे पहले ही सांझीछत आ गया और हमें उतार दिया गया।
वैसे तो भवन मे पूरे साल भीड रहती लेकिन कोविड के चलते इस बार कम लोग ही दिखाई दे रहे थे। लेकिन जैसे ही हम भवन तक पहुंचे वहां दर्षनार्थियों का जमावडा था । हम भी अपना समान क्लाॅकरूम में जमा कर दर्षन करने के लिए चले गए। जैसे जैसे हम मुख्य गुफा के समीप पहुच रहे थे माहौल पूरा भक्तिमय हो चुका था हर जगह जैयकारे की आवाज गूंज रही थी। षायद इसी अभूतपूर्व षंाती की तलाष में लोग यहां आते है। और फिर मां के पिण्डी स्वरूप में दर्षन कर अपनी मुरादों पूरी करते हैं। और फिर अगली बार आने का आषिर्वाद लेकर अपने अपने गंत्व्य को लौट जाते है।
दर्षन के बाद मुझे तो बहुत जोरों की भूख लगी थी और इतना थक चुके थे कि थोडा सा उपर चलकर किसी होटल में जाकर खाना खाने की हिम्मत नही हुई और हमने मनोकामना भवन में जाकर राजमा चावल से ही पेट पूजा कर ली। दर्षन करते करते पांच से उपर हो चुके थे। भैरो बाबा के दर्षन को जाने वाले उडन खटोले की टिकिट खिडकी बंद हो चुकी थी। और हम उपर तक जाने के लिए हिम्मत हार चुके थे। आखिरकार हमने हिमकोटी वाले सादा रास्ते से वापिस जाने का सोचा और चल दिये। जैसे तैसे अर्धक्वारी पहुचे हिम्मत जवाब दे चुकी थी। मैने तो तुरंत एक अपने साईज का हटटा कटटा सा घोडा किया और बाणगंगा तक पहुंचा । और फिर थ्री व्हीलर कर होटल। रात भर होटल में आराम कर अगले दिन जम्मू के लिए रवाना हो गये। वहां से सम्बलपुर एक्सपे्रस पकडी जो अम्रतसर होते हुए दिल्ली और फिर अगले दिन सुबह सुबह हमें अलीगढ उतार कर अपने गंतव्य की ओर जाती है।
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Amazing travelogue.
ReplyDeleteThank you so much
DeleteBadiya, please keep sharing more experience and inspire us
ReplyDeleteपढ़ कर ऐसा लगा जैसे हम स्वयं ही सफ़र कर रहे हों।
ReplyDeleteGood travel blog .....
ReplyDeleteघर बैठे ही आपने हमें जम्मू सैर करवा दी ......आपका आभार👌
ReplyDeleteShandar
ReplyDeleteशानदार यात्रा वृतांत, जय माता दी🙏
ReplyDeleteजय माता की।
ReplyDeleteSir apna experience share kijiye. Apne jaha jaha travel kiya h waha ki bhi post daale .
ReplyDeleteGood information thanks for sharing us
ReplyDeleteVery Good...Jai Mata Di...
ReplyDeleteIt's amazing 👍👍👍
ReplyDeleteबहुत सुंदर यात्रा व्रतांत
ReplyDeleteBhut acha lga sir pdhkr , aapne to Ghr bethe mata rani k darshan krva diye ,jai mata di 🙏🙏
ReplyDeleteShandar, padtae padtae aisae LGA kaisae hum bhi satth satth Mata ji Kae dware a rahae,Jai Mata di 🙏
ReplyDeletesir ,bhot khoob ,Jai Mata Rani ki
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