एक रूमाल दो बिस्कुट और कुछ यादें -पार्ट -II

जितेंद्र सिंह |                                                                                                                                     

मां की तबियत दिन पर दिन और बिगडती जा रही थी । जिन्हे मैने हमेंशा लाज और हया के परदे में देखा वो आज इतनी बेसुध थी कि उन्हें ना अपने कपडों का होश था ना अपने शरीर पर कोई काबू। मुझे याद नही पडता कि मैने उन्हें कभी बिना सर ढ़के देखा हो। न्यूरो स्पेशलिस्ट ने जैसे ही बताया कि उन्हें तुरंत किसी अस्पताल में दाखिल करवाने की ज़रूरत है, मेरे तो होश ही उड़ गए। समझ नही आ रहा था कि मैं क्या करूं। 

अलीगढ़ वैसे तो ठीक ठाक शहर है लेकिन स्वास्थ्य व चिकित्सा सुविधाओं के मामले में काफी पीछे है। मुझे याद है कि अभी कुछ साल पहले जब डेंगू बुखार की लहर चल रही थी तब हालात कितने गम्भीर थे। गुनगुन की मम्मी भी उसी दौरान डेंगू से मरते मरते बची थी। और वो भी दिवाली का ही समय था । अलीगढ़ में ज्यादातर प्राईवेट हॉस्पिटल मरीज़ के साथ सारे प्रयोग करने के बाद जब उस में कुछ नही बचता है तो कह देते है इन्हें दिल्ली ले जाओ, ये केस हमारे बस का नही। 

खैर उस दिन राम नवमी थी और अगले दिन दशहरा। एसे में सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों व अन्य स्वास्थ्य कर्मियों का आभाव ही रहता है। मैं गुनगुन की मम्मी के मामाले में काफी भुगत चुका हूं। तो मैने तुरंत ही निर्णय किया कि हम मम्मी को नौएडा के कैलाश अस्पताल में ले जाऐंगे। मैं , प्रशांत और रानी वहां से तुरंत निकले व हम रास्ते में अपने घर पर उतर गए। हमने तुरंत कुछ जरूरी सामान पैक किया और दोने बच्चों को लेकर प्रशांत के घर चल दिए। वेदिका और गुनगुन को अपनी मौसी के घर पर छोड कर हम दोनो प्रशांत के साथ उसकी गाडी में नौएडा के लिए निकल पडे।


रास्तें में मम्मी को कभी होश आ जाता था तो वो हम से बात कर लेती थीं। लेकिन उनहे कुछ भी एहसास नही हो रहा था कि उन्हें हुआ क्या है। पुरे रास्ते मुझे रह रह कर मम्मी की पुरानी बातें याद आ रहीं थी और आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। एक अजीब सा डर भी था कि आगे क्या होगा , कैसे होगा। मम्मी की ये हालत मुझ से जरा भी देखी नही जा रही थी। रास्तें में लगातार फोन बज रहा था कभी मौसी का तो कभी दीदी तो कभी किसी ना किसी रिश्तेदार का। सभी को पूरा अपडेट चाहिए था । तभी जब हम नौएडा पहुचने ही वाले थे तो एक फोन आया । दूसरी ओर से आवाज़ आई , तू क्या सोच कर मां को यहां ले आया। तुझे लगता है दिल्ली का कोई भी हॉस्पिटल बाहरी पेशेंटस को एसे ही ले लेगा। कोई रेफरेल है तेरे पास । तुझे पता है ईलाज का कितना खर्चा होगा जो मुंह उठा के यहां आ गया। मैं सिर्फ सुनता रहा मैने कोई जवाब नहीं दिया। मेंरी आंखें में सिर्फ आंसू थे जो रूक नही रहे थे। मुझे कुछ सूझ ही नही रहा था। मेरे लिए उस पल को शब्दों में बयान कर पाना नामुमकिन है। 

आखिरकार हम मम्मी को लेकर शाम के साढ़ तीन बजे तक कैलाश अस्पताल के इमरजेंसी में दाखिल हो गए। वहां डाक्टरों ने पहले सारी रिपोटें देखी फिर अपनी सारी जांचें करने लगे। तब तक हम मम्मी के पास ही थे। वो थोडा बहुत बात कर रहीं थी।मम्मीअस्पताल व डॉक्टरों के नाम से बहुत घबराती थी। हमेंशा कहती थी हे भगवान मुझे चलते फिरते उठा लेना, मुझे अस्पताल ना जाना पडे। लेकिन होता वही है जो किस्मत में लिखा हो। शायद यही वजह होगी कि वो अस्पताल में आ कर बिल्कुल सहम सी गईं और हर सवाल का जवाब सिर्फ हां या ना में देने लगीं। रात के आठ बज चुके थे डॉक्टर ने बताया कि इनकी हालत जब तक सुधर नही जाती तब तक हम इन्हे न्यूरो के आइ सी यू में रखेंगे। और ये कब तक ठीक होगी और पूरी तरह से ठीक होंगी या नही, व पहले की तरह हो पाऐंगी कुछ भी कहा नही जा सकता। अभी हम इनका एम आर आई करवायेंगें फिर दिमाग की स्थिति का पूरा पता चलेगा। ये सुनने के बाद हमारे पास और कोई चारा नही था। फिर वे मां को आई सी यू वार्ड में ले जाने लगे। हम सब भी साथ में ही थे। मै मां से लगातार बात करने की कोशिश कर रहा था मैने उन्हे समझाने की बहुत कोशिश की कि वे घबराऐं नही हम सब उनके साथ ही है। लेंकिन धीरे धीरे उन्होने खामोशी की चादर ओढ़ ली। मैने सोचा भी नही था कि मां के साथ बिताए ये मेरे आखिरी पल होंगे। नही तो मै उन्हें वहां पर अकेला नहीं छोडता । अस्पताल के अपने नियम होते हैं वे आई सी यू वार्ड में किसी को रूकने नही देते। तो आखिरकार हम सबको वापिस जाना ही पडा। और पेशेंटस से मिलने का समय भी खत्म हो चला था। 

गुनगुन की मौसी शमां, पे टीएम में प्रोडक्ट मैनेजर के पद पर कार्यरत थी । और प्रशांत भी एक नामी कम्पनी में उूचें पद पर था। लेकिन ये दोनों करोना के बाद से ही घर से काम कर रहे थे। वैसे तो ये दोनो मेरे मुशकिल समय में हमेंशा मेंरे काम आए हैं। लेकिन इस बार इन्होने मेरी बडी मदद की। इनका नोएडा के सैक्टर 78 हाइड पार्क में अपना फलैट था जिसकी चाभी इन्होने हमे दे दी । वे लोग अलीगढ़ गए थे और वहीं रहकर काम कर रहे थे। इस फलैट के मिलने से हमारी ठहरने व खाने पीने की सभी समस्याऐं खत्म हो गई।लेकिन मेरी परेशानियां कम होने का नाम ही नही ले रहीं थी। मम्मी को भर्ती तो कर दिया लेकिन असली समस्या थी इलाज के लिए इतने पैसे कहां से आऐंगे। उपर से मेरे छोटे बच्चे जो कभी अलग नही रहे वो अपनी दादी और हमें बहुत ज्यादा याद कर रहे थे। 

पिता जी एक भूतपूर्व सेना अधिकारी थे। उनके जाने के बाद मां को भारतीय सेना की तरफ से पेंशन के अलावा भी बहुत सी सुविधाऐं मिली । उनमें से एक थी ई सी एच एस सेवा जिसके तहत आश्रितों को चयनित अस्पतालों में मुफत इलाज की सुविधा मिलती है। लेकिन उसके लिए आश्रितों को एक कार्ड बनवाना पडता है  मैने काफी प्रयास कर के ई सी एच एस कार्ड बनाने की प्रकिया को शुरू कर दिया था। लेकिन कुछ कागजों के पूरा ना होने की वजह से कार्ड बन नही पाया था। इधर मेरे अपनों ने मुझे सुना सुना कर मेरी परेशानियों को और बढ़ा दिया। जैसे कार्ड बनवाना सिर्फ मेरी ही जिम्मेदारी हो। पहले ही मैं इतना परेशान था उपर से उनके ताने मुझे तीर की तरह चुभ रहे थे। मेरी मनोदशा को शायद मै आपको कभी समझा पाउूं। उस दिन राम नवमी थी और सुबह से एसे ही भाग दौड में भूख का एहसास ही नही हुआ। खैर रात को दस बजे के आस पास शमा के फलैट पर पहुंच कर हमने अपना नौ दिनों का उपवास खोला। 

अगले दिन हम लोग सुबह ठीक समय पर कैलाश हॉस्पिटल पहुंच कर हम सब मां से मिलने गए। लेकिन शायद मां हम सब से रुठ गई थी । मेरे लाख अवाज़ देने पर भी वो कुछ ना बोली , ना मेरी तरफ एक बार भी देखा । जैसे वो कहना चाहती हों कि मुझे यहां पर लाकर अकेला क्यों छोड गए। जब मैने डॉक्टर से इसके बारे में पूछा तो उन्होने बताया कि इन्हे होश आने में समय लगेगा। इघर हॉस्पिटल वाले बार बार कार्ड की कॉपी जमा करने के लिए कहने लगे। मैने बताया कि मैं जल्दबाजी़ में कार्ड लाना भूल गया, एक आध दिन में अलीगढ़ जाकर ले आउंगा। लेकिन वो कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे।  उघर धर वालों को एक और मौका मिल गया मुझें जलील करने का। हर कोई अपनी नसीहत देने लगा। मुझे सबने एक नाकारा और कामचोर इंसान घोषित कर दिया। आखिरकार मैने ये फैंसला किया कि मैं अगले दिन सुबह उठकर अलीगढ़  जाकर कार्ड का पता लगाउंगा। 

मेरे बडे भइया के साले का बेटा कैलाश में ही अकाउंटेंट है और उसकी पत्नी वहीं पर डाइटीशियन। उसने बिलिंग विभाग से बात कर के हमें कार्ड जमा करने के लिए दो दिनों की मौहलत दिला दी। फिर क्या था मै सबसे पहले उस ऐजेंट के पास गया जो कार्ड बनवाता है उसने मेरे आवेदन का स्टेटस चेक किया। पता चला कि मेरी एप्लीकेशन किस दस्तावेज के कारण रूकी हुई थी। मै फौरन दौड़ा पीएन बी की ओर और वहां पहुंच के पता चला कि जो व्यक्ति यह दस्तावेज बना कर देगा वो आज छुटटी पर है। मैने मैनेजर को जाकर अपनी बात बताई । तो उसने भी अपने हांथ खडे कर दिए और बोला आप 2 दिन बाद आना। मैने बहुत आग्रह किया लेकिन वो बोला मैं मजबूर हूं। 

मुझे समझ नही आ रहा था कि मैं क्या करूं उपर से घर वालों ने ताने मार कर मुझे पहले ही बहुत दुखी किया हुआ था। फिर मुझें सीमा के बारे में याद आया। सीमा मेरे साले अमित की घर्मपत्नी है और बैंक ऑफ बड़ौदा में काम करती थी । मैने तुरंत सीमा को फोन लगाया । उसने कहा जीजाजी आप परेशान ना हो मै कुछ करती हूं। फिर उसने अपने एक पुराने सहकर्मी को फोन किया वो पीएनबी की किसी और ब्रांच में काम करता था। लेकिन काफी समय पहले सीमा के ऑफिस में ही था । उसने सिंर्फ दस मिनिट में अपने सिस्टम से पेंशन की स्लिप निकाल कर मुझे भेज दी। मैने उसका प्रिंट निकाला , तुरंत बैंक मैनेजर के पास गया व उससे उस पर साईन करवा लिए । वो भी मेरी तरफ हैरानी से देखने लगा कि मैने ये कागज़ कैसे निकलवाया।  और फिर मैने उस पेंशन स्लिप को एजेंट को देकर ऑनलाईन अपलोड करवा दिया। इससे मेरी आवेदन प्रक्रिया पूरी हो गई। सीमा को भी शायद इस बात का एहसास ना हो कि उसने जाने अनजाने में मेरी कितनी बडी मदद कर दी। मैने अभी तक किताबों में पढा़ था ईश्वर अपने भक्तों की मदद के लिए किसी ना किसी रूप में आ ही जाते हे, आज देख भी लिया मैंने दिल से उसें धन्यवाद दिया और फिर मै अगले दिन सुबह नौएडा पहुंच गया। 

मम्मी की हालत और बिगड़ती जा रही थी। उन्हे देख कर एसा लगता था कि मानों कोई बरसों से सोया ना हो और वो गहरी नींद में हो । मेरे लाख बोलने पर भी वो आंख खोल कर मुझे देख ना सकीं । मै हर बार आईसीयू में इस उम्मीद से जाता कि शायद आज कोइ अच्छी खबर मिल जाए। शायद आज मां को होश आ जाए। लेकिन ईश्वर को शायद ये मंजूर नही था। लकिन इतना सब करने के बाद भी मेरी मुश्किलें कम ना हुई। पता नही ईश्वर को मेरी और कितनी परीक्षा लेनी थी। इघर अस्पताल की दी हुई दो दिनों की मौहलत अब खत्म हो चुकी थी और वे दो लाख रूपये तुरंत जमा करने पर अड़ गए। मैने जैसे तैसे दो लाख रूपये का इंतजाम किया और कैश काउंटर पर जाकर जमा करवाए । लेकिन फिर भी वे नही माने और मुझे बार बार कार्ड जमा करने के लिए दबाव बनाने लगे। 

मैं फिर अलीगढ़ गया और ऐजेंट ने मुझे बताया कि अब इसमें उसकी कोई भूमिका नही । ये एक प्रकिया है जिसमें समय लगता है। मुझे कुछ भी समझ नही आ रहा था कि मैं आखिर अब क्या करूं। उधर हॉस्पिटल का मीटर चालू था। और मेरे पास इतने पैसे नही थे कि मैं हॉस्पिटल का बिल चुका पाउं। दूसरी तरफ परिवार वालों और जान पहचान वालों के फोन पूरे दिन मुझे परेशान करने के लिए काफी थे। तभी मेरी बुआजी के बेटे का फोन आया, मम्मी का हालचाल पूछने के लिए। वे बीएसएफ में फार्मासिस्ट हैं। उन्होने कहा कि तुम कल मेरे साथ ईसीएचएस के दफतर चलना वहां का इंचार्ज कर्नल साहब है वो हमारी मदद जरूर करेगा।कर्नल साहब बडे ही भले मानस थे । उन्होने मेरी पूरी बात को सुना और मुझे एक ईमेल आई डी दी और कहा कि इस पते पर ईमेल करो और अपनी सारी जानकारी भेजो। मैने वैसा ही किया और मै फिर वापिस नौएडा आ गया। 

उधर घर वालों के ताने अभी भी जारी थे। वे बार बार मुझे मेरे असफल होने का एहसास कराते रहते। इधर मेरी गैर हाजिरी में मां का घ्यान मेरी पत्नी, मेरी बहन व जीजाजी रखते थे। वो रोज सुबह आते थे। हास्पिटल के पीछ उनकी भूमिगत पार्किंग है व उसके उपर तीमारदारें के बैठने के लिए कुछ बैंच है व घास का मैदान। वो लोग पूरे दिन वहीं रहते और शाम को मम्मी से मिलने के बाद वापिस चले जाते। 

आखिरकार ना जाने भगवान को कैसे मुझ ग़रीब पर थोड़ी सी दया आगई। रविवार का दिन था और मैंने कुछ देखने के लिए मोबाईल निकाला तो देखा कि एक संदेश था स्क्रीन पर। आपका ईसीएचएस कार्ड का आवेदन स्वीकार कर लिया गया है । आप यहां से अस्थाई कार्ड डाउनलोड कर सकते हैं । जो छह माह के लिए वैध है। इसे पढ़ कर मेरी खुशी का ठिकाना नही था। मैं खुशी के मारे उछल पडा और तुरंत कार्ड डाउनलोड कर अस्पताल में जाकर जमा करा दिया। एक पल तो एसा लगा मानो मेरी सारी समस्याऐं एक झटके में खत्म हो गई। ये शायद उस ईमेल का कमाल था , या यूं कहें कि उपरवाले की निगाह मुझ पर सीघी थी। 

लेकिन मां की स्थिति जस की तस थी । मैं जब उन्हे देखने गया तो एक अजीब बात हुई। आई सीयू की एक नर्स थी जो हमेंशा बडे प्यार से बात करती थी। वहां के बाकी स्टाफ की तुलना में वो काफी नरम दिल थी। टूटी फूटी हिंदी बोलती थी , उसकी भाषा से पता चलता था कि वो साउथ इण्डियन है। उस दिन वो नर्स मुझ से पूछने लगी कि एक जो़ दीदी आपकी मम्मी को मिलने आती है वो आपकी कौन है । मैने पूछा क्यों , तो वह बोली, जब वो आपकी मम्मी का हांथ पकडती हैं तो उनकी आंखों की पुतलियां हिलने लगती है। जैसे मानो वो कुछ कहना चाह रहीं हों लेकिन बोल नही पा रहीं। और उनकी आंखों से आंसू गिरने लगते है। शायद आपकी मां उनके स्पर्श को पहचान लेती है। मैने कहा वो मेरी बडी बहन है। इसे बात ने मेरे दिल की तकलीफ और भी ज्यादा बढा़ दिया। 

लगता है उपरवाले से मेरी खुशियां देखी नहीं जातीं। अगले दिन मुझे हॉस्पिटल से फोन आया कि आप तुरंत आ जाईये हमें आपसे कनसेंट लेनी है। हमें आपकी पेशेंट को वेटीलेटर पर लेना है। मै मां को लेकर दुखी हो रहा था कि दूसरे ही पल शमां का फोन आया । उसने बताया कि गुनगुन को दो तीन दिन से बहुत तेज़ बुखार आ रहा है। कल तो 104 था । उसने जांच करवाई तो डेंगू का पता लगा। उसने आगे बताया कि वो रात को तेज बुखार में पता नही क्या क्या बडबडाने लगती है। वो खुद गुनगुन की इस स्थिति से काफी धबरा गई थी। क्योकि वो कुछ खा पी भी नही रही थी। और डॉक्टर ने कहा था कि अगर ये कुछ पीएगी नहीं तो ठीक नही होगी। मै उसका इशारा समझ गया था। समझ नही आ रहा था कि ऐसे में मैं क्या करूं । एक तरफ मां और दूसरी तरफ मेरी बेटी। मैने मन ही मन में सोचा कि और कितनी परीक्षा लोगे भगवान । मैने घर वालों से बात की और शाम को अलीगढ़ के लिए चल दिया। क्याकि कुछ साल पहले मै उसकी मम्मी के केस में देख चुका था। डेंगू के केस ज़रा सी लापरवाही से बिगड जाते है। 

मैं अलीगढ़ आ तो गया लेकिन मेरा पूरा ध्यान मां की ओर ही था। लेकिन गुनगुन की भी घ्यान रखना बडा मुश्किल था। वो कुछ खाती ही नहीं थी। कैसे कैसे उसे समझा के जबरदस्ती कुछ खिलाता पिलाता। मेरी महनत रेग लाई और धीरे धीरे उसकी सेहत में सुधार होने लगा। उधर दीदी जीजाजी उनके दोनो बेटे आकाश व हर्ष और रानी मेरी गै़रहाजिरी में मां का ध्यान रखे हुए थे। लेकिन मां की स्थिति में कोई भी सुधार नहीं हो रहा था। हमने दूसरे डॉक्टर्स को रिपोर्ट दिखवा कर उनकी राय भी ले ली थी। मां को भर्ती हुए लगभग 19 दिन हो चुके थे। और मै अगले ही दिन नौएडा जाने की तैयारी कर रहा था। 

अगली सुबह अस्पताल से फोन आया कि डॉ साहब आप से बात करना चाहते है। उन्होने बताया कि एक टेस्ट की रिपोर्ट से पता चला है कि आपकी पेशेट के दिमाग में कोई वायरस चला गया है। जो अंदर ही अंदर उनके दिमाग की नसों को खा रहा है इसलिए ये होश में नहीं आ पा रही है। लेकिन इसका इलाज है और हम जल्दी ही उन्हें ठीक कर पाऐंगे। ये सुनकर मै खुशी से पागल हो गया। उस दिन सेमवार था। मै काफी सालों से सोमवार को व्रत करता हूं। मै मंदिर गया व प्रशाद चढ़ाया और खुशी खुशी घर आ गया। मुझे अपनी मां को फिर से मिलने की उम्मीद जो जाग गई थी। ये बात मैने सब को बताई । सभी बहुत खुश हो गए। लेकिन जब दीदी को फोन लगाया तो उसने कुछ और ही कहानी बताई। उसके मुताबिक आज मां की तबियत बिल्कुल भी ठीक नही थी। उसे तो एसा लग रहा था कि उनके शरीर में जैसे कुछ है ही नहीं । मां का शरीर बिलकुल ठण्डा पड गया था। मैने सोचा की शाम को चलते है तो देखेंगे। एक तरफ सोचने लगा की आज सुबह ही तो डॉक्टर ने बताया था कि वो ठीक हो जाऐंगी। फिर एसा क्यों हो रहा है। कुछ तो गलत है। खैर इसी असमंजस में दिन बीत गया और ना जाने कब शाम हो गई । मै ने सोचा कल सुबह तडके उठ कर नोएडा के लिए निकलूंगा। 

घडी में साढ़े सात बजे थे मै सोफे पर बैठा कुछ सोच रहा था कि गुनगुन व्रत खालने के लिए खाना लेकर आ गई। बोली पापा आप  खाना खा लो। मेरे दिल में ना जाने क्यों घबराहट सी हो रही थी। कुछ अजीब सी पशेमानी थी। मेरा कुछ भी खाने का मन नहीं कर रहा था लेकिन फिर भी उसकी जिद पर मैने जैसे तैसे एक निवाला तोडा ही था कि मेरे फोन की घंटी बजने लगी। फोन उठाया तो उघर से आवाज़ आई कि आप राजेश्वरी देवी के घर से बोल रहे हैं। मैने कहा हां बताईये मैं उनका बेटा बोल रहा हूं। मै कैलाश हॉस्पिटल से बोल रहा हूं। आपकी माताजी की अचानक तबियत बिगडने से हम उन्हें बचा नही पाए । उन्हे मल्टी ऑरगन फेलियर हो गया है। आप जल्दी से आजाइये। 













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