एक रूमाल ,दो बिस्कुट और कुछ यादें
ना जाने क्यूं आज सुबह से कुछ लिखने का मन कर रहा है, दिमाग में ख्याल तो बहुत उमड रहे है लेकिन शब्द बन कर कलम तक नही आ रहे। और ना जाने क्यूं दिल भी कुछ उदास सा है। किसी काम में दिल नही लग रहा । ये साल मेरी जिंदगी का सबसे खराब साल रहा । मेंरा ही क्यों ना जाने कितने ही लोगों के लिए ये साल कभी ना भुलने वाली यादें छोड कर गया है।जिसे दुनिया की सबसे बडी त्रासदी कारोना महामारी के लिए इतिहास के पन्नों में लिखा जाएगा। बचपन से लेकर आज तक मैने कभी एसा समय नही देखा ना ऐसे समय की कल्पना की जब सबकुछ होते हुए भी कुछ नही था। पहली बार खुद को इतना असहाय महसूस किया ।
जहां से सुनो वहीं से एक अप्रिय समाचार मिल रहा था। एक भी अच्छी खबर नही । हर समय एक डर दिमाग में था कि कहीं मेरे बच्चों या मेरी मां जो कि मुझ सबसे ज्यादा प्रिय है, को कुछ हो ना जाए। वो इसलिये भी क्योंकि वे ज्यादा सेवेंदनशील थे इस बीमारे के लिए। जिस तेजी से यह महामारी हर किसी को अपना शिकार बना रही थी एसे में ये डर स्वाभाविक था । ना घर से बाहर निकलना ना किसी को अंदर आने देना । हर चीज को संदेह की दृश्टि से देखना । यहां तक की अखबार को भी सेनेटाईज कर के पढना। अपने प्रिय लोगों के साथ भी अजनबियों जैसा व्यवहार करना पडेगा ये सब किसी ने सोचा था क्या । इस महामारी ने सबको क्या क्या नही करवाया। लेकिन ईश्वर की कृपा से हम इस बुरे सपने से सकुशल बाहर आ गए। किसी ने सही कहा है कि रात कितनी लम्बी व अंघियारी क्यों ना सुबह को तो होना ही है।
खैर मै भी क्या लेकर बैठ गया। ऐसा लग रहा है मानो सफाई करते करते मुझे किसी कोने में पडी धूल फांकती कोई पुरानी फोटो एल्बम मिल गई हो और मैं उसमें झांकते ही पुरानी यादों में खो गया हूं। तभी पीछे से एक आवाज आती है क्या पूरे दिन एसे ही बर्बाद करना है अभी बहुत सारा काम पडा है करने को और तुम ना जाने क्या सोचने बैठ गए। बताने की जरूरत नही है इनका परिचय आप समझ ही गए होंगे । इन यादो से बाहर निकलकर मैं वर्तमान में आ गया । पत्नी जी दनदनाती हुई कमरे में आई और मुझे एक चादर देकर बोली की बैठे बैठे कुछ हिल लिया करो कम से कम इस बिस्तर की चादर ही बदल दो। इस हुक्म की तामील तो करनी ही थी । मैं मुंह बना कर बुरे मन से बुड बुडाते हुए चादर बदलने लगा। और करता भी क्या। तकिये का कवर बदलते समय मेरे हांथ में कुछ आ गया। देखा तो एक छोठा सा कढाई वाला लेडीज रूमाल था जिसपे गुलाबी रंग का बॉर्डर था और उस पर फूल पत्तियां बनी हुई थी ।उस रूमाल में कुछ बंघा हुआ था। मैने बडी उत्सुकता के साथ उसे खोलकर देखा तो उसमें कुछ दस पांच और बीस के नोट व रैपर में लिपटे गुड डे के दो बिस्किट निकले।
इसे देखकर मै कुछ ठहर सा गया। बहुत सम्भाला पर अपने आप को रोक नही सका और इन आसुओं का क्या है ये कभी भी दगा दे देते है। आखिर उस रूमाल में मां की ममता और ढेर सारी यादें जो जुडी थी। एक पल को तो एसा लगा कि मुझे मेरी मां मिल गई। तुरंत ही समझ में आ गया कि सुबह से मन क्यूं उदास था। मां की याद कुछ एसी ही होती है। हम आखिर कितने ही बडे क्यों ना हो जाऐं लेकिन मां के आगे सभी बच्चे ही होते है । दरअसल मां की आदत थी वो चाय के साथ दो बिस्किट लेती थी और जो पैकेट में बच जाते थे उन्हें रूमाल में रख लेती थी अगले दिन के लिए। इस बात को लेकर हम अक्सर हंसा करते थे।
इस वाकये के बाद सब कुछ याद आने लगा। मां से जुडी हर वो याद मुंझे सताने लगी।
अक्तूबर के महीने की बात है। साल था 2021 । तब मैं अपनी ग्रेड अप की बढिया नौकरी छोडकर हरियाणा के ऐक छोटे से शहर भिवानी में एक अस्थाई नौकरी कर रहा था आराम इतना था कि करोना के चलते घर से आनलाईन क्लास लेनी होती थी लेकिन बाद मे वहा जाकर रहना पडा। तो मुझे एक लम्बे समय तक घर में रहने के बाद आखिरकार भिवानी जाना पडा। घर पर मेरी दोनों बेटियां गुनगुन और वेदिका , मेरी पत्नी व मेरी मां रहते थे। अलीगढ शहर में हमारा 60 साल पुराना पैत्रिक घर है। जिसमें कभी हम पांच भाई बहन एक साथ रहा करते थे। लेकिन आज सिर्फ मेरा परिवार ही यहां रहता है। भिवानी जाना मुझे इसलिए भी पसंद था क्योंकि इस शहर से मेरी बचपन की अनगिनत यादें जो जुडी है। दूसरा मेरी बडी बहन भी यही रहती है। मां बाप के बाद मुझे कोइ सबसे ज्यादा प्यारा है तो वो मेरी बहन ही है। जो मुझ से अपनी हर दुख सुख की बातें साझा करती है।
ये नवरात्रो से पहले की बात थी। मुझे भिवानी में रहते हुए एक साल से ज्यादा हो चुका था। राम नौमी व दशहरे की छुटटी थी तो मै अष्टमी की रात को रेल से घर पहुंचा । रात के करीब साढे बारह बज चुके थे मम्मी व बच्चे सो रहे थे चूंकि मेरा व्रत था तो मुझे कुछ खाना नही था। तो मै भी सीघा अपने कमरे में चला गया। पहली बार एसा हुआ कि मै इतने दिनों बाद घर आया हूं और मम्मी मुझे सोते हुए मिली मैने भी सेचा कि शायद ज्यादा थक गई होगी इसलिए मैने उन्हे सोने दिया, जगाया नही। सेचा कल सुबह आराम से बात करेंगे। लेकिन मुझे क्या पता था कि वो सुबह कभी ना आएगी। गुनगुन को पापा के आने का बेसब्री से इंतजार था क्योंकि उसे मां कि शिकायतें जो करनी थी। लेकिन नींद के चेलते वो भी सो गई थी।
हम लोग देर रात तक इघर उघर की बातें कर रहे थे कि गुनगुन जाग गई और वो अपनी बातें करने लगी। हमें बातें करते करते करीब डेढ बज गया। अचानक किसी के जोर से गिरने की आवाज आई । हम दौडे तो देखा मां अपने कमरे के दरवाजे पर गिरी पडी थी और उठने का प्रयास कर रही थी। लेकिन उठ नही पा रही थी हमने तुरंत उनको उठा कर बिस्तर पे बिठाया । उनके कपडे गीले हो गए थे उन्हे बदला और उनके पैरों की मालिश की । उन्हे समान्य अवस्था में लाए। उनसे बहुत पूछा कि क्या हुआ कैसे गिर गई पर वो कुछ भी स्पश्ट रूप से बता नही सकी। हमें भी समझ में कुछ नही आया। मैने उनका बीपी देखा तो वो नॉर्मल था सो मै बेफिक्र हो गया। ओर वो आराम से बात भी कर रही थी। तो हमे लगा सब ठीक है। उन्होने खुद कहा सो जाओ सुबह देखेंगे। तो हम सो गए।
सुबह उठे तो मां ने बाथरूम ले जाने के लिए मुझे आवाज लगाई मै तुरत उन्हें लेकर गया और वो मेरे सहारे से बिना किसी ज्यादा मुश्किल के चली गई। वैसे उन्हे सालों से घुटने के दर्द की शिकायत थी लेकिन अपना काम वो स्वयं कर लेती थी। सुबह से उनके हाव भाव ठीक नही लग रहे थे । चाय पीत पीते वो सो गई । जगाने पर उनकी आंख नही खुल रही थी। और वो बार बार बेसुध सी हो रही थी। कुछ समझ में नही आ रहा था जबकि उनका बीपी सुबह भी नॉरमल था। पत्नी बोली इनकी तबियत कुछ ठीक सी नही लग रही तुम तुरंत इन्हे डॉक्टर के पास ले जाओ। ये सुबह नौ बजे की बात है। अलीगढ में 10 बजे से पहल कोई डॉक्टर बैठता ही नही । मै फोन पर पर्चा लगवा के बिना नहाऐ घोए तुरंत डॉ आलोक गुप्ता के पास पहुच गया। डॉक्टर साहब ठीक दस बजे अपने क्लीनिक में बैठ गए थे मेरा पहला नम्बर था। मैने जब उनको मां का हाल बताया तो वो तुरंत समझ गए कि ये न्यूरो का केस है। बोले उनहे तुरंत किसी न्यरो को दिखाओ। ये सुनकर तो तो मेरे पैरो के नीचे से जमीन निकल गई । मैं तुंरत उनको न्यूरो सर्जन के पास ले गया। उसने देख कर बोला कि इनहें जितना जल्दी हो सके किसी अस्पताल में भर्ती करवाओं क्ययोंकि इन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ है।
शेष भाग अगली पोस्ट में पढें

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Keep it up
ReplyDeleteKeep it up
ReplyDelete“A touching story that shows how a mother’s love is the purest form of care.”
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