संध्या शांताराम के साथ हिंदी सिनेमा के एक युग का अंत
जितेंद्र सिंह | अलीगढ़
संध्या शांताराम एक परिचय
बॉलीवुड की फिल्म दो ऑंखें बारह हांथ किसे याद नही होगी। एक आदर्शवादी जेलर जो छह खुंखार कैदियों को सुघारने के एक उनूठे प्रयोग में अपने प्राणों की आहूति दे देता है। जिसकी आंखें उन पत्थर दिल इन्सानों के दिलों में ममता जगा देती है। जिसका एक गीत ए मालिक तेरे बंदे हम इतना कर्णप्रिय हुआ कि आज भी कई विद्यालयों में प्रार्थना के तौर पर गाया जाता है।फिल्म में कहानी और संगीत के अलावा भी कुछ था जिसने इस फिल्म को शीर्श पर पहुंचाया। और वो थी खिलौने वाली चंम्पा जो राह से भटके इन कैदियों को नेकी की राह पर चलना सिखाती है। जो नहीं जानते उन्हें हम बता दें की हम बात कर रहे हैं हिंदी और मराठी फिल्मों की एक उत्कृष्ट अदाकारा संध्या की । जो पिछले 4 दशकों से गुमनामी मे जीते हुए अभी कुछ दिन पहले ही हम सब को छोड कर चली गईं।
संध्या शांताराम के करिअर की शुरूआत
शांताराम की कालजयी फिल्म अमर भूपाली से हिंदी फिल्मों में कदम रखने वाली संध्या रंगमच में काम करती थी। साधारण से चेहरे मोहरे वाली इस कलाकार को उसकी दमदार आवाज़ की वजह से चुना गया। और अपनी पहली ही फिल्म में जबरदस्त अदाकारी के दम पर उन्होने दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बना ली। वे बहुत कम अदाकाराओं में से एक थी जिन्होने सिर्फ वी शांताराम के साथ ही काम किया। होली का वो गीत याद है अरे जा रे हट नटखट । आजतक शायद ही कोई होली एसी बीती हो जब ये गीत आपके कानों में ना पडा हों। या जिसकी धुन पर आप थिरके नां हों। फिल्म विशेशज्ञ मानते हैं कि इस से बेहतर आज तक होली के लिए कोई गीत नही बना। चाहे फिर वो इसके बोल हों, या इस पर संध्या का नृत्य , या फिर महेंद्र कपूर व आशा की मखमली आवाज़ का जादू। जबकि वे एक कुशल नृत्यांगना नहीं थी। फिर भी उन्होने इस गीत को अमर बना दिया । इस गीत को जिस सृजनात्मकता के साथ पर्दें पर उतारा गया गया वो सिर्फ शांताराम जैसे फिल्मकार के लिए ही सम्भव है। इसके अलावा नवरंग फिल्म के शेष गीत जैसे कि आधा है चंद्रमा और तू छुपी है कहां भी उनके नृत्य कौशल के लिए हमेंशा याद किए जाऐंगे। शायद खुद शांताराम भी मानते होंगे कि नवरंग जैसी बहुरंगी और संगीतमय प्रस्तुति की कल्पना बिना संध्या के नहीं की जा सकती ठीक वैसे ही जैसे बिना महज़बीन के पाकीज़ा़।
संध्या और उनका नृत्य के प्रति लगाव
संध्या को अपने एक और ज़बरदस्त अभिनय के लिए कभी भुलाया नही जा सकेगा। फिल्म थी झनक झनक पायल बाजे। फिल्म का एक गीत नैन सो नैन नाहीं मिलाओ ,प्रेम की शाश्वत अभिव्यक्ति को दर्शाने का इससे उत्कृष्ट उदाहरण शायद ही कभी देखने कों मिले । जो उस दौर का सर्वश्रेष्ठ प्रेम गीत माना जाता है। इस गीत का आकर्षण आज के युवाओं के बीच लोकप्रिय गीत पहला नशा से कहीं ज्यादा है। ऐसा माना जाता है कि शांताराम शस्त्रीय संगीत और नृत्य को समर्पित एक फिल्म बनाना चाहते थे। मुश्किल ये थी कि संध्या नृत्य में पारंगत नहीं थी । और दूसरी ओर उनके विपरीत फिल्म में पण्डित गोपी किशन को लिया गया था , जो उस दौर के सबसे बडे नृत्य सम्राट थे। लेकिन फिर भी संध्या ने सब कुछ छोड कर पहले नृत्य सीखा और इस तरह इस कालजई फिल्म का निर्माण हुआ। फिल्म को फिल्मफेयर व राश्ट्रीय पुरूस्कार से नवाजा़ गया।
लता मंगेश्कर के गीतों में संध्या
फिल्मी गीतों की बात हो और लता जी का नाम ना आए ऐसा कैसे हो सकता है। सेहरा फिल्म मे उनका गाया एक गीत जिसे संध्या ने अपनी अदाकारी से लोकप्रिय बना दिया वो था पंख होते तो उड आती रे। ये कहना अतिश्योक्ति नही होगा कि यदि हिंदी फिल्मों के सर्वश्रेष्ठ गीतों की एक सूची तैयार की जाए तो यह गीत र्शीष दस गीतों में शुमार होगा । आज भी जब दूरदर्शन पर रंगोली कार्यक्रम का ज़िक्र आता है तो बहुत से लोगों को याद होगा कि कैसे वो इस गीत को सुनने के लिए यह कार्यक्रम देखा करते थे। और आकाशवाणी पर इस गीत को सुनने वालों की कितनी फरमाइशें आया करती थीं। हालांकि फिल्म सेहरा कुछ खास नही थी लेकिन संगीतकार रामलाल के संगीत निर्देंशन ने इसे यादगार बना दिया। और एक दिलचस्प बात, इस फिल्म में जितेंद्र और मुमताज़ एक छोटी सी भूमिका में थे। जितेंद्र की तो यह पहली फिल्म थी।
वी शांताराम और उनकी समाजिक फिल्में
शांताराम एक प्रयोगधर्मी फिल्मकार थे जिन्होने हिंदी और मराठी सिनेमा के माध्यम से गम्भीर समाजिक मुददों को आवाज़ दी और लोगों की सोच को बदलने का प्रयास किया । उनकी फिल्म दुनिया ना माने, आदमी ,पडोसी, दहेज, और सुबह का तारा समाज में बेमेल विवाह, महिलाओं के अधिकार, साम्प्रदायिक सौहार्द , दहेज प्रथा व पुनर्विवाह जैसे विषयों पर केंद्रित रहीं। इस से हट कर उन्होने डॉ कोटनीस की अमर कहानी, स्त्री, शाकुंतला, तीन बत्ती चार रास्ता, परछांई, सेहरा, नवरंग, गीत गाया पत्थरों ने, जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली और पिंजरा जैसी सफल फिल्में भी बनाई।
उनकी अघिकतर फिल्मों में उनकी दूसरी पत्नी जयश्री या तीसरी पत्नी संध्या ही मुख्य भूमिकाओं में नज़र आतीं। उन्होने अपनी बेटी राजश्री को पहली बार फिल्म गीत गाया पत्थरों ने के जरिये दर्शकों से मिलवाया। करियर के आखिरी पडाव पर आते आते उन्होने डॉ श्रीराम लागू और संध्या को लेकर उस दौर की एक बोल्ड फिल्म पिंजरा का निर्माण किया जिसे समीक्षकों ने काफी सराहा। इस फिल्म में संध्या तमाशा करने वाली एक औरत के किरदार में नज़र आती हैं जों एक सीधे साधे स्कूल मास्टर , जो कभी उस नौटंकी का सबसे ज्यादा विरोध करता है को अपने प्रेम जाल मैं ऐसा फंसाती है कि वो ना घर का रहता है ना घाट का। फिल्म का संगीत और नृत्य इस फिल्म की विशेशता है।
संध्या की एक और फिल्म है जिसका ज़िक्र करे बिना ये लेख पूरा नही होगा। और वो थी जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली। इस फिल्म ने एक बार फिर संघ्या को अपने नृत्य कौशल के लिए बॉलीवुड में स्थापित किया। उन्होने ये साबित कर दिया कि नृत्य को गरिमा के साथ किया जाऐ तो प्रेम को अभिव्यक्त करने का इससे ज्यादा रमणीय और मनोहर कुछ नही हो सकता। इस फिल्म का एक और गीत कजरा लगा के बिंदिया सजा के और मन की प्यास मेरे मन से ना निकली भी संघ्या के नृत्यों और अपने संगीत के लिए आज भी बहुत लोकप्रिय है।
इस महान अभिनेत्री का यूं खामोशी से रूख़सत हो जाना हिंदी सिनेमा के एक युग के अंत होने जैसा है । जिस सम्मान की वो हकदार थी वो उन्हें कभी नहीं मिला। इतनी कमाल की भूमिकाऐं करने के बाद भी उनकी किस्मत में सिर्फ लोगों के ताने और गालियां ही आई । लेकिन दुख तो इस बात का है कि उन्हें शांताराम से प्रेम करने की सजा़ मिली । उन्होने एक साधारण जीवन जीते हुए अपने पति की मृत्यु के बाद भी उनके परिवार और बच्चों का साथ नहीं छोडा। एसे में उनका एक और गीत याद आता है . तारों में सज के , अपने सूरज से देखो धरती चली मिलने। एसा लगता है वो अपने गीतों के ज़रिये हमें कह रही हों जो मैं चली , फिर ना मिलूंगी, जो मैं चली ।
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ReplyDeleteNicely disseminated 🙌🏻
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