जितेद्र सिंह | अलीगढ़
सत्यकाम,अनुपमा, चुपके चुपके, शोले और मेरा गांव मेरा देश जैसी क्लासिक हिंदी फिल्मों के जरिये दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले सदाबहार अभिनेता घर्मेंद्र का मुम्बई में निधन हो गया वे 89 साल के थे व पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे । अभी कुछ दिनों पहले ही उन्हें मम्बई के ब्रीच कैण्डी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनके निघन से फिल्म जगत के साथ साथ पूरे देश में शोक का माहौल है।
एसे में बॉलीवुड के इस महान कलाकार के जीवन से जुडा एक मशहूर किस्सा याद आता है। क्या आप जानते हैं कि जिस खूबसूरत अभिनेता के पीछे सारी दुनिया दिवानी थी आखि़र वो किस के दिवाने थे। अगर आप मीना कुमारी या हेमा जी के बारे में सोच रहें हैं तो आप बिल्कुल ग़लत सोच रहे हैं। हम बात कर रहें है उस काली औरत की जिसका ख्वाब हर फिल्म कलाकार देखता है। अब भी नही समझे। अगर आपने गीतकार इरशाद कामिल की क़िताब काली औरत का ख्वाब पढ़ी होती तो आप समझ जाते कि हम जिस काली औरत के ख्वाब के बारे मे बात कर रहे है वो कोई और नही बल्कि फिल्म जगत का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान फिल्मफेयर है जिसे पाने की चाहत हर कलाकार को होती है ।

ये किस्सा 1997 के फिल्मफेयर पुरूस्कार समारोह का है जिसमें धर्मेंद्र को फिल्मों में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए दिलीप कुमार व शाहरूख खान के हांथों फिल्मफेयर के
लाईफटाईम अचीवमेंट पुरूस्कार से सम्मानित किया गया था। जिस काली औरत का ख्वाब वो हमेंशा से देखते थे उसे पाकर इस दिग्गज कलाकार के दिल का गुबार आंसू बन कर फूट पडा। जब उन से कुछ कहने के लिए कहा गया तो वे अपने आप को रोक नहीं पाए। उन्होने बताया कि जब जब उनकी कोई फिल्म हिट़ होती तो वो हर बार इस उम्मीद में एक नया कोट पैंट सिलवाते कि शायद उन्हें इस बार फिलफेयर मिल जाए। लेंकिन हर बार वे खाली हांथ लौटते। सालों तक यह सिलसिला चलता रहा और उन्हें अपनी फिल्मों के लिए कभी भी बेस्ट एक्टर का खिताब नहीं मिला। आखिरकार उन्होंने सूट सिलवाना बंद कर दिया । साठ के दशक में उनकी कितनी फिल्में गोल्डन जुबली हिट हुई फिर भी वे फिल्मफेयर से महरूम रहे । सैंतिस साल के लम्बें इंतजार के बाद आखिर फिल्मफेयर को उन पर तरस आ गया। जबकि सत्यकाम का वो आदर्श वादी युवक अनुपमा का वो खुद्दार लेखक शोले का वीरू चुपके चुपके का वो शुद्ध हिंदी बोलने वाला ड्राईवर । ना जाने कितने ही किरदार हैं जिनका ज़िक्र किया जा सकता है। लेकिन क्या घरम पाजी किसी एक किरदार के लिए भी फिल्मफेयर पाने के हकदार नहीं थे। पता नहीं क्यों कभी कभी इस प्रतिष्ठित संस्था पर भी भरोसा नहीं होता।

ऐसा ही एक और किस्सा है अभिनेता घर्मेंद्र का। बॉलीवुड के इस सबसे खूबसूरत स्टार के अपने सहयोगी नायिकाओं के साथ अफेयर के चर्चे भी अक्सर होते रहते थे। एक समय में उनका नाम ट्रेजेडी क्वीन
मीना कुमारी के साथ जोडा गया था। बहुत से लोग ये मानते हैं कि इन दोनो के अफेयर के चलते मीना कुमारी और उनके शौहर
कमाल अमरोही के बीच दूरियां पैदा हुई। लेकिन इस अफेयर की भनक जब कमाल साहब को पडी तो उन्होने
पाकीजा़ में मुख्य किरदार के लिए
राजकुमार को साइन किया। और तो और इसका बदला लेने के लिए उन्होन अपनी अगली फिल्म
रज़िया सुल्तान में एक अश्वेत गुलाम की भूमिका में रखा। एसा माना जाता है कि
पाकीजा़ में मुख्य किरदार के लिए कमाल अमरोही ने पहले घर्मेंद्र को कास्ट किया था। और उनके साथ कुछ दृश्य भी शूट किये जा चुके थे जिन्हें बाद में फिल्म से हटाया नहीं गया। जैसाकि वो दृश्य जिसमें राजकुमार चलती हुई ट्रेन में चढ़ जाते है और मीना कुमारी के डिब्बें में घुस जाते है। इस दृश्य में वो ट्रेन पकडने वाला शख्स कोई और नहीं बल्कि धर्मेंद्र ही है ।
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| Dharmendra with wife Prakash Kau |
हिन्दी सिनेमा के इतिहास में यदि किसी अभिनेता ने रोमांस, एक्शन और भावनात्मक अभिनय तीनों को एक साथ जीया है तो वह हैं धर्मेन्द्र। अपने सादगी भरे व्यक्तित्वए मोहक मुस्कानए दमदार संवाद अदायगी और दिल को छू लेने वाली भावनात्मक अभिनय शैली के कारण वह दर्शकों के दिलों पर आज भी राज करते हैं। उन्हें फ़िल्म इंडस्ट्री में हीमैन के नाम से भी जाना जाता है।धर्मेन्द्र का जन्म 8 दिसंबर 1935 को पंजाब के फगवाड़ा में एक साधारण परिवार में हुआ। बचपन से ही उनका रुझान फिल्मों की ओर थाए लेकिन उन्हें फ़िल्म जगत तक पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा। उन्होंने कई संघर्षों के बाद फ़िल्मफ़ेयर मैगज़ीन द्वारा आयोजित टैलेंट सर्च प्रतियोगिता जीती और यहीं से उनके सपने ने उड़ान भरनी शुरू की।1960 में फ़िल्म दिल भी तेरा हम भी तेरे, से अपने करियर की शुरुआत की। शुरुआती वर्षों में वे एक रोमांटिक हीरो के रूप में पहचाने गए और उनकी सरलता एवं मासूमियत ने दर्शकों का मन जीत लिया।
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| Actor Dharmendra with his wife Prakash Kaur |
1960 और 70 के दशक के दौरान वे हिंदी सिनेमा के सबसे सफल और व्यस्त अभिनेताओं में शामिल हो गए। धर्मेन्द्र ने 300 से अधिक फ़िल्मों में अभिनय किया है। उनके निभाए कई किरदार आज भी क्लासिक माने जाते हैं। इनमें से कुछ हैं
आया सावन झूम के,
शोले ,
अनुपमा,
सत्यकाम ,
आई मिलन की बेला,
हकीकत ,
फूल और पत्थर,
लोफर ,
जुगनू सीता और गीता ,
राजा जानी ,
यादों की बारात ,
तुम हसीन मैं जवान ,
प्रति़ज्ञा, चरस ,
आजा़द ,
चंदन का पालना ,
पूर्णिमा ,
मंझली दीदी आदि । धर्मेन्द्र सिर्फ एक अभिनेता नहीं बल्कि एक युग हैं। उनकी फ़िल्में उनका अंदाज़ और उनके संवाद आने वाली कई पीढ़ियों के कलाकारों के लिए प्रेरणा हैं। घर्मेन्द्र का फ़िल्मी सफर न सिर्फ मनोरंजन की कहानी है बल्कि प्रेरणा की मिसाल भी है। हिंदी सिनेमा में धर्मेन्द्र का योगदान अतुलनीय है। उनकी मेहनत, लगन, सादगी और विशाल हृदय उन्हें एक महान कलाकार ही नहीं बल्कि एक महान इंसान भी बनाते हैं।
जाने कैसे धर्मेन्द्र की मौत की झूठी खबर फैलाने पर मीडिया की हुई किरकिरी
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