सोशल मीडिया पर बैन कितना ज़रूरी | आस्ट्रेलिया से सबक ले भारत सरकार | अभिभावकों के जी का जंजाल बना सोशल मीडिया
जितेंद्र सिंह | अलीगढ़
जब भी कोई नई तकनीकि बाजार में आती है तो लोग उत्सुकता के चलते उसके गुणो से प्रभावित होकर उसे अपना तो लेते हैं, लेकिन उससे भविष्य में होने वाले परिणामों के बारे में नहीं सोचते। । किसी भी नई तकनीकि या उपकरण के परिणाम काफी देर के बाद सामने आते है और तब तक काफी देर हो चुकी होती है। ऐसा ही कुछ सोशल मीडिया के साथ हुआ । 2003 में जब सोशल मीडिया दुनिया में धूम मचाने लगा तब किसी ने इसके नकारात्मक प्रभावों के बारे में नही सोचा । लेकिन आज ये हमारी आदत में शुमार हो चुका है। हमने अपने बच्चों के हांथों में मोबाइल तो दे दिया लेकिन अब उनकी जिंदगी से इसे वापिस लेना टेढी खीर बन गया है। सेाशल मीडिया के जितने फायदे है उतने ही नुकसान भी हैं ,खासकर के बच्चों के लिए। जिन्हें नजरअंदाज़ करना कोई समझदारी नही है ।
देश जिन्होने लगाया सोशल मीडिया पर बैन
ऐसा ही कुछ स्पेन की सरकार ने किया है। उन्होने सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाने की उम्र को 14 से बढा कर सोलह कर दिया है। वहीं इटली में चैदह साल से कम उम्र के बच्चों को अभिभावकों की बिना अनुमति के सेाशल मीडिया पर खाता खेालने की मनाही है।
लेकिन दक्षिण कोरिया की पहल सबसे सराहनीय है। उन्होने बच्चों को सोशल मीडिया की लत से बचाने व उनके शैक्षिक स्तर को सुघारने के लिए स्कूलों में मोबाईल फोन व किसी अन्य डिजिटल उपकरण के प्रयोग पर पूरी तरह से रोक लगा दी है जो साल 2026 से प्रभावशाली होगी। इंडोनेशिया व मलेशिया में भी 16 साल से कम उम्र के यूजर्स के अकांउंट को बंद करने की तैयारी चल रही है। व सरकार ने सोशल मीडिया को अपने उपभोग्ताओं की आयु सत्यापन करने के दिशा निर्देश दिये है। इसी तरह उत्तरी अमेरिका भी किड्स ऑनलाईन सेफटी एक्ट, कोसा के जरिये बच्चों को सोशल मीडिया की बुरी लत से बचाने की तैयारी में है। हमारे पडोसी मुल्क चाईन ने भी इन एप्लेकेशन्स पर उम्र के अनुसार सक्रीन टाईम पर प्रतिबंद्ध लगाने के लिए दिशा निदेंश जारी किए हैं। इसके अलावा भी बहुत सारे उदाहरण हैं जहां अभिभावकों की रजामंदी पर 13 से 16 के बच्चों को सोशल मीडिया पर खाता खोलने की अनुमति दी जाएगी।
सोशल मीडिया और बच्चों का भविष्य
एक तरफ जहां दुनिया भर के देश सोशल मीडिया से होने वाले खतरे को भांप चुके है और बच्चों को इससे दूर रखने के लिए नीतियां बना रहे हैं । वही दूसरी ओर हमारी सरकार है जो स्कूल के बच्चों के लिए रोज नए डिजिटल एप लॉंच कर रही है और सरकारी स्कूलों को मजबूर कर रही है कि वो बच्चों को इन एप से जुडने के लिए प्रोत्साहित करे।। आज लोगों के बीच एक नया शगूफा छिडा हुआ है जिसे डिजिटल डिटाक्स कहते हैं। जिसका मतलब है कुछ निर्धारित समय के लिए सोशल मीडिया से दूरी बनाना जो आजकल ट्रैंडिंग भी है। लेकिन ये दिखावे से कहीं ज्यादा समय की जरूरत है जिसे जितना जल्दी समझ लिया जाये उतना कम है ।
करोना महामारी, ऑनलाईन शिक्षा के नाम पर बच्चों के हांथों मे मोबाईल फोन थमा गई। लेकिन समझने की बात ये है कि बच्चों को मोबाइल देना उस समय की जरूरत थी। आज परिस्थितियां बदल चुकी है। इसमें काफी हद तक स्कूल के टीचर भी उतने ही गुनेहगार हैं जो बच्चों को नोट्स देने की जगह भर भर के पीडीएफ भेज देते है। एक समय था जब टीचर क्लास में खुद नोट्स लिखवाते थे जो बच्चों को याद भी रहते थे । आज आप चाह कर भी बच्चों को मोबाईल से दूर नहीं रख सकते क्योंकि उनके पास बहाना है उनके स्कूल से जुडी हर सूचना मोबाईल पर ही आती है।
बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के क्या है उपाय
दिक्कत सरकार की किसी एप के लॉंच करने से नहीं है । दिक्कत तो बच्चों के सोशल मीडिया के उपयोग करने से है । इन एप्स पर कभी भी कोई भी अपत्तीजनक वीडियो, संवाद, चित्र या गीत आदि आ जाते हैं जिसे बच्चों की नजर से बचाना मुश्किल है। इसके लिए कुछ हद तक वो लोग भी उतने ही जिम्मेदार हैं जो सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होने के लिये फूहड व अश्लील वीडियो, गाली गलौच व निम्न स्तरीय भाषा का सहारा लेते हैं । बच्चों को इससे सिर्फ उनके स्कूल या खुद कंटेंट बनाने वाले ही दूर रख सकते है। स्कूल वालों को चाहिये कि वे बच्चों के फोन लाने पर सख्त कार्रवाई करें व मोबाईल के माध्यम से बच्चों तक संदेंश पहुचाने का कोई और विकल्प तलाशें। वहीं दूसरी ओर यदि सोशल मीडिया पर कंटेंट बनाने वाला हर क्रिएटर ये सोच कर कंटेंट बनाने लगे कि एक दिन उसके अपने बच्चे भी इसे देख सकते है तो शायद उन्हें थोडी शरम आ जाए और सरकार को कोई कानून बनाने की जरूरत ही ना पडे। इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें:
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