अपनी आखिरी फिल्म इक्कीस से सबको रूला गये घर्मेंद्र पाजी

फिॅल्म समीक्षा - "इक्कीस"

जितेंद्र सिंह | अलीगढ़

लोग अक्सर दुनिया छोड़कर चले जाते है लेकिन वो यादों में हमेंशा ज़िदा रहते हैं। अभी पिछले ही दिनों बॉलीवुड ने अपने सबसे चहेते और ज़िंदादिल अभिनेता धर्मेंद्र को हमेंशा के लिए खो दिया। लेकिन श्रीराम राघवन की फिल्म ईक्कीस को देख कर लगता है कि वो कहीं नहीं गए यही है। इस फिल्म ने दर्शकों के दिलों में एक बार फिर से उन्हे जिंदा कर दिया है। 

1971 के भारत पाक युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी ये फिल्म परमवीर चक्र विजेता से. लें. अरून खेत्रपाल की सच्ची कहानी पर आधारित है । 


ढाई घंटे की यह वॉर बायोपिक वर्तमान और अतीत की दो कहानियों को एक साथ ले कर चलती है । पहली कहानी है मदन लाल खेत्रपाल यानी की अभिनेता धमेंद्र की पाकिस्तान यात्रा की और दूसरी उनके बेटे अरून की शहादत की ।  शुरूआत का एक घंटा अरून की एन डी ए की ट्रेनिंग और उनके लव अफेयर पर केंद्रित है तो दूसरा 1971 की बसंतसर की लडाई पर। कहनी के सूत्रधार है ब्रिगेडियर नासिर जो एक पाकिस्तानी अघिकरी हैं और मदन लाल को उनको स्कूल की रीयूनियन में हिस्सा लेने के बहाने पाकिस्तान आने की दावत देते है। क्योंकि नासिर के दिल पर एक बोझ है जो उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहा है । वो मदन लाल से मिलकर कर इस बोझ को हल्का करना चाहते हैं। नासिर का परिवार पाकिस्तान में धर्मेंद्र की शानदार मेज़बानी करता है। वो अपने स्कूल की रीयूनियन में जाते है और अपने पुराने साथियों से भी मिलते हैं । साथ ही अपने पैतृक गांव सरगोधा भी जाते हैं जहां उनका बचपन बीता है। इत्तेफाक से यही पर उनके बेटे की शहादत भी हुइ थी। 

फिल्म फलैशबैक और वर्तमान के बीच मे आंख मिचौनी खेलती है जिसे एडिटिंग की मदद सें बडी ही सहजता से प्रस्तुत किया गया है जो आपको अहसास ही नहीं होने देता कि कब आप अतीत में होते है और कब वर्तमान में। फिल्म का पहला भाग ज़रूरत से ज्यादा लम्बा है जिसे छोटा किया जा सकता था। एक बार को तो एसा लगता है मानो आप एनडीए का वर्चुअल टूर कर रहे हैं । वार सीक्वेंस को भी थोडा कम किया जा सकता था। फिल्म का क्लाईमैक्स बहुत ही हृदयस्पर्शी हैं और आपको इमोशनल कर देगा। एक द्श्य में ब्रिगेडियर नासिर के साथ साथ दर्शक भी धर्मेंद्र की प्रतिक्रिया को देखने के लिए थम से जाते है और मन ही मन ये कल्पना करने लगते हैं कि एसी स्थिति में वो क्या करेंगे। लेकिन वो एक बहादुर सेना अधिकारी होने का परिचय देते हुए दर्शकों को निशब्द कर देते है। 

अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा इस फिल्म से अपना डेब्यू कर रहे हैं हालांकि इससे पहले वो एक वेब सीरीज भी कर चुके हैं। अरून खेत्रपाल की भूमिका में अगस्त्य साबित कर देते हैं कि उन्हें अभिनय विरासत में मिला है। अगस्त्य के साथ साथ घर्मेंद्र को भी बराबर का स्क्रीन स्पेस दिया गया है। जिससे ये लगता है इस फिल्म के दो हीरो है। घर्मेंंद्र की जितनी तारीफ की जाए कम है। उन्होने पंजाबी में एक खास कविता भी लिखी है और उसे गाया भी है। जो आपको बहुत ही नॉस्टेंल्जिक लगेगा। उनका एक डायलॉग दिल में घर कर जाता है। वो कहते हैं -"ये जंग नस्लें और फसलें दोनो को बर्बाद कर देती है, पता नही कब खत्म होंगी ये जंगें"।  इसके अलावा नासिर की भूमिका में जयदीप अहलावत कमाल करते हैं । पाताल लोक के किरदार से कहीं हटकर एक संजीदा और सुलझे हुए आर्मी ऑफिसर। अक्षय कुमार की भतीजी सिमर भाटिया की भूमिका छोटी जरूर थी लेकिन अहम थी। इसके अलावा सिकंदर खेर और सुहासनी मूले भी अपनी छाप छोडने में कामयाब है।

फिल्म एक नई बहस को जन्म देती है । कुछ बुद्विजीवि मानते हैं कि ये फिल्म पाकिस्तान की छवि को सुधारने का प्रयास करती है। जो एक प्रोपोगैण्डा लगता है। जबकि 71 के युद्ध के दौरान कितने ही मासूम सैनिकों की जानें गई है। 1971 में जो हुआ वो इतिहास है और हम सभी उस से वाकिफ है। लेकिन सिनेमा अभिव्यक्ति का एक माध्यम है । फिल्म इस जंग के एक दूसरे पहलू पर प्रकाश डालती है। ऐसा नही है कि इस फिल्म से किसी नापाक देश की छवि सुधर सकती है अगर ऐसा ही करना होता तो फिल्म के आखिरी दृश्य में वो पाकिस्तान की सरकार व इंटेलीजेंस की धज्जियां नही उडाता।


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