फिल्मी नही है , हिंदुस्तानी महिलाओं के हक की वकालत है शाह बानो के तीन तलाक और मुआवजे़ की कहानी

फिल्म समीक्षा. - हक़

जितेंद्र सिंह |अलीगढ़

इंदौर के बहुचर्चित शाह बानो केस पर आधारित ये कहानी है शाज़िया बानो की जिसकी शादी एक अमीर घराने में होती है। उसके शौहर एक वकील हैं। शादी के बाद सब कुछ ठीक चल रहा होता है शाज़िया के दो बच्चे भी होते हैं और तीसरा आने की तैयारी में है। काम में ज्यादा मसरूफ रहने की वजह से शाज़िया और उसके शौहर के रिश्तों में धीरे धीरे दूरियां बढ़ने लगती है। एक ज़रूरी काम के बहाने वो शहर से बाहर जाता है और इस बीच वो शाज़िया से ना के बराबर सम्पर्क करता है । और एक दिन अचानक वो दूसरी शादी कर के अपनी नई दुल्हन को घर ले आता है। शाज़िया चाह कर भी इसका विरोध नहीं कर पाती। वो दोनो परिवारों के बीच अपने रिश्ते को बचाने की पूरी कोशिश करती है लेकिन जब उसे पता चलता है कि उसकी दूसरी बीवी उसकी पहली प्रेमिका थी और उसने परिवार के दबाव में आकर शाज़िया से शादी की थी तो वो अपने बच्चों को लेकर अपने पिता के घर चली आती है। 

और यहां से होती उसकी ज़िदगी में मुसीबतों की शुरूआत। कुछ समय बाद जब उसका शौहर उसे पैसे भेजना बंद कर देता है । तो वो मजबूर होकर उससे बात करने जाती है । उसका शौहर गुस्सें में आकर उसे तीन बार तलाक बोल कर अपनी ज़िंदगी से अलग कर देता है।

अपने बच्चों को पालने के लिये वो पूरी शिद्दत से संधर्ष करती है। शाज़िया का मानना है कि जिस तरीके से उसके पति ने उसे तलाक दिया है वो इस्लाम में जायज़ नहीं है। उसे तलाक ए बिद्दत कहा जाता है। जिसके लिये वो काज़ी साहब के पास भी जाती है लेकिन वो उसकी एक नहीं सुनते। मजबूरन वो अपने हक के लिए अदालत का दरवाजा़ खटखटाती है। और इस दुखियारी की दरख्वास्त भी सिर्फ 400 रूपये है और वो भी अपने बच्चों के पालन पोषण के लिए। शाज़िया के इस मुकद्दमें को मज़हबी रंग दे कर समाज में उसका हुक्का पानी बंद हो जाता है। लेकिन वो हार नही मानती। अब एक तरफ शरिया कानून है और दूसरी तरफ शाज़िया की मांग। उसका पति शरिया कानून का हवाला देते हुए कोर्ट में ये साबित कर देता है कि इसके लिये मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड है क्योंकि इस्लाम में निकाह महज़ एक कॉन्ट्रेक्ट है दो पर्टीयों के बीच। जिसे महर की रकम देकर कभी भी तोडा जा सकता है, और इस केस की सुनवाई इस अदालत में नहीं होनी चाहिये। और वैसे भी जब शाज़िया बानो को तलाक़ मिल गया तो वो किसी की बीवी नही है तो फिर मुआवजा़ किस बात का। आखिर कार बहुत बहस और मुबाहिशों के बाद जब शाज़िया की वकील बेला जैन सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देती है तो अलीगढ़ सैशन कोर्ट को इस पर विचार करना ही पडता है। और वो मुकद्दमा जीत जाती है लेकिन शाज़िया का शौहर इस मामाले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाता है । आखिरकार जीत शाज़िया की ही होती है। 

तीन तलाक़ का मुददा हमेशा से ही बहुत सवेंदनशील रहा है। इस पर कुछ बोलने या लिखने से पहले किसी को भी कम से कम किसी इस्लामिक स्कॉलर या मुस्लिम क्लैरिक से बात कर पुख़्ता जानकारी लेनी चाहिये। 

आइये जानते है तीन तलाक के बारे में 

 निकाह के बाद अगर पति पत्नी में कोई मतभेद हो जाए या पुरुष किसी भी वजह से अपनी पत्नी को तलाक देना चाहे तो वोरू पति अपनी पत्नी को केवल तीन बार तलाक बोल कर उससे तलाक ले सकता था।

मैसेज में लिख कर या फ़ोन पर भी अगर तीन बार तलाक बोल दे तो उसे भी तलाक माना जाता था।

अगर कोई कागज चिठ्ठी पर भी तीन बार तलाक लिख कर अपनी पत्नी तक पहुंचा दे तो इसे भी तलाक कहा जाता था। 

इस तलाक को तलाक उल बिदअत भी कहा जाता है। इस तलाक को इस्लामिक कानून में मान्यता मिली हुई है और इस तरह के तलाक को पति और पत्नी दोनों को मानना पड़ता है लेकिन मुस्लिम महिलाएं अक्सर इसका विरोध करती रही हैं क्योंकि इसमें उनकी मर्जी या खुशी शामिल नहीं होती। लेकिन अब ट्रिपल यानी तीन तलाक को हमारे देश में पूरी तरह से असंवैधानिक और गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है।

तलाक.ए.अहसन 

तलाक.ए.अहसन में तीन बार तलाक नहीं बोलना पड़ता। इसमें एक बार तलाक कह कर तीन महीने रुकना पड़ता है। अगर इन तीन महीनों में भी पति.पत्नी के संबंध नहीं सुधरते तो तलाक हो जाता है। इस तरह से स्त्री को भी एक मौका मिलता था और पति.पत्नी की खुशी व इच्छा से यह तलाक होता है। तीन तलाक ही नहीं बल्कि इस्लाम में कई अन्य तलाक के तरीके भी है जैसे कि तलाक.ए.अहसनए तलाक.ए.हसनए तलाक.ए.मुबारत। दुनिया भर के लगभग 22 देशों ने तीन तलाक को बैन कर दिया है जिसमें पाकिस्तानए ईरानए मोरक्कोए कतर आदि शामिल हैं। इसमें मिस्र दुनिया का पहला देश है जिसने तीन तलाक को बैन किया। वहीं पाकिस्तान ने भी 1956 में इसे बैन कर दिया था। कई देशों में अगर कोई व्यक्ति तीन बार भी तलाक कहता है तो भी उसे एक ही बार माना जाता है। उसके बाद दोनों पति.पत्नी को समय दिया जाता है। यही नहींए आप बोले गए तलाक को वापस भी ले सकते हैं। सूडान में इस्लाम मानने वाले लोग सबसे अधिक हैं लेकिन वहां भी तीन तलाक को नहीं माना जाता।

ये फिल्म यामी गौतम के करियर की अब तक की सबसे बढ़िया फिल्म है और हो सकता है इसे इस साल इसे सबसे ज्यादा अवार्ड मिले। इमरान हाशमी ने भी इस फिल्म में कमाल का काम किया है। इन दोनों के अलावा अगर कोई और है जिसने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है वो है शीबा चडढा़ जो फिल्म मे बानों की वकील बेला जैन की भूमिका में है। निदेंशन और एडिटिंग की नज़र से भी फिल्म 

इस फिल्म को अगर आप उस चश्में से देखेंगें जिससे आज तक सारी दुनिया ने शाह बानो केस को देखा है तो ये फिल्म आपको भी एक प्रोपोगैण्डा का हिस्सा ही लगेगी। वहीं इसके दूसरे पहलू पर नज़र डालेंगें तो आपको नज़र आएगी दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर एक अनपढ़ लाचार औरत जिसके सिर पर तीन बच्चों का बोझ है ,जिसके पति ने उसकी बिना रज़ामदी के दूसरी शादी कर , उसे मेहर की रकम देकर चाय के कप में पडी मक्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक दिया। जो अपने बच्चों के पालन पोषण के लिए महज 400 रूपये मुआवजे के लिए अदालत के चक्कर लगा रही है। जो अपने समाज की उस सोच के खिलाफ लड रही है जिसमें शादी एक पवित्र बंधन नही है बल्कि दो पार्टियों के बीच एक कॉन्ट्रेक्ट है जिसे शौहर जब चाहे तब अपनी मर्जी़ से तोड सकता है । लेकिन सवाल ये भी है कि अगर शादी एक कॉन्ट्रेक्ट है तो उसे तोडने से पहले  दोनो पार्टियों को रजा़मंद होना भी तो ज़रूरी है। दूसरा देश में युनिफॉर्म सिविल कोर्ट की वकालत भी काफी समय से की जाती रही है। हालांकि अभी कुछ सालों पहले ही साकार ने तीन तलाक को रोकने के लिये कानून बनाया है।

 दिक्कत किसी के तलाक देने में नहीं है। दिक्कत एक बार में तीन तलाक बोलकर शादी जैसे सम्बंधों को हमेशा के लिए खत्म कर देने से है। क्योकि उसके बाद सुलाह करने के लिए कोई गुंजाईश नहीं बचती। यदि कोई फिर से अपने सम्बंधों को जोडना चाहे तो सजा़ के तौर पर औरत को ही हलाला से गुज़रना पडता है। यानी अपने पहले पति से शादी करने के लिए किसी और मर्द से शादी करने बाद उसे तलाक देकर वह उपने पहले पति से दोबारा शादी कर सकती है। लेकिन हर बार भुगतना औरतों को ही क्यों पडता है। यदि औरतों के लिए हलाला है मर्दों के लिए कुछ क्यों नही। शरियत और मज़हब की आड़ में महिलाओं के साथ हमेंशा सें मर्द उन पर ज़ुल्म करते आऐ है। इससे बचने के लिये औरतों को आगे आकर अपने अधिकारों के बारे में जानना होगा। ये स्थिति हमारे देश में आम है जहां औरतों को उनके हक के लिए अभी और भी बहुत सी लडाईयॉं लडना और जीतना बाकी है। 


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Comments

  1. Nicely written sir. Abhi tak film nahi dekhi par ab lag raha hai dekhna padega.

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    1. Its a must watch film to understand the intensity of Triple Talaq

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